धार्मिक

दिवाली: मां लक्ष्मी को खुश करना है तो घर में बनाएं ये चिन्ह

दीवाली के शुभागमन पर संपूर्ण वातावरण प्रकाशमय हो उठता है।

दीवाली के शुभागमन पर संपूर्ण वातावरण प्रकाशमय हो उठता है। यह पर्व आनंद, उल्लास और प्रकाश का पर्व होने के साथ-साथ धन-प्राप्ति अनुष्ठान के लिए भी सबसे उतम माना जाता है। यह अपने साथ धन-त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा और भाई-दूज पर्व लेकर आता है इसलिए यह ‘पंचपर्व’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक अमावस्या को समुद्र-मंथन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। दीवाली से जुड़े अनेक प्रतीकों का प्रयोग सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है जिनका हर किसी के जीवन में बहुत महत्व है। मां लक्ष्मी को खुश करना है तो घर में बनाएं ये चिन्ह

स्वस्तिक: स्वस्तिक का अर्थ है शुभ, मंगल और कल्याण करने वाला। यह देवताओं का प्रतीक है। यही कारण है कि सभी शास्त्रों में इसे शुभता और सकारात्मक ऊर्जा देने वाला बताया गया है। कोई भी मांगलिक कार्य स्वस्तिक की रचना किए बिना पूर्ण नहीं समझा जाता। हर पूजा, व्रत, त्यौहार या मंगल अवसर पर सिंदूर या कुमकुम से इसे बनाया जाता है। यह गणेश देव का स्वरूप है इसलिए इसकी स्थापना जरूर करनी चाहिए।

ओ३म्: यह प्रतीक ब्रह्म को अभिव्यक्त करने वाला पवित्र शब्दांश है। ओम् का उच्चारण आत्मिक बल देता है। इसके सात बार उच्चारण से शरीर के रोग दूर होने लगते हैं। ऋषि-मुनियों ने हर मंत्र के आगे ओ३म् जोड़ा है।
कमल: कमल लक्ष्मी जी का प्रिय पुष्प है इसीलिए लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए इन्हें कमल पुष्प अर्पित किए जाते हैं। कमल का फूल हमें सिखाता है कि जिस तरह कीचड़ में खिल कर भी वह सबकी ओर आकर्षित होता है वैसे ही आदर्श हम भी अपने आने वाली पीढिय़ों के सामने रखें।

कलश: पानी से भरा, आम की पत्तियों से ढंका मिट्टी का घड़ा, उस पर अनाज से भरा ढक्कन और उस पर रखे हरे नारियल को पूजा करने से पहले मुख्य देवी या देवता के निकट स्थान दिया जाता है। इनके पीछे यह मान्यता है कि आम के हरे रंग के पत्ते शांति और स्थिरता के प्रतीक हैं तो पानी से भरा घड़ा व अनाज वाला ढक्कन धन-वैभव का।

आम के पत्ते: आम के पत्तों का मंगल कार्यों में विशेष महत्व है। इनका प्रयोग कलश स्थापना व वंदनवार बनाने में होता है। मौली के धागे की गांठों में बांधकर आम के पत्तों से वंदनवार बनाकर घर के हर दरवाजे पर इसे टांगा जाता है। हर वंदनवार पर सिंदूर से एक ओर शुभ तथा दूसरी ओर लाभ लिखना होता है।

लक्ष्मी-गणेश जी: सब जानते हैं कि देवी लक्ष्मी धन-वैभव की देवी हैं और गणेश जी शांति के देव हैं। जहां शांति होती है वहीं लक्ष्मी देवी भी वास करती हैं। दीवाली की रात इन दोनों की उपासना कर शांति और समृद्धि-वैभव दोनों को ही आमंत्रित करते हैं।

दीया: दीया अर्थात् जिसने सदा दिया। इसका संबंध मात्र मिट्टी के पात्र से नहीं है बल्कि यह आशा का प्रतीक भी है। इसकी लौ केवल रोशनी नहीं देती बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर व नीचे से ऊपर उठने की प्रेरणा भी देती है। दीया स्वयं अंधेरे में रह कर दूसरों के घर को प्रकाशित करने का संदेश देता है। दीवाली पर विधिपूर्वक दीये जलाना अति शुभ माना गया है। लक्ष्मी-पूजन के बाद अनेक छोटे दीये जला कर उन्हें चौराहे पर, नल के पास, तुलसी के पौधे के पास, पीपल के नीचे व घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर रखा जाता है। सभी दीयों में सरसों के तेल की बाती रखी जाती है।

लक्ष्मी-चरण: दीवाली पर लक्ष्मी माता के चरणों को चित्रित करके उन्हें अपने घर आमंत्रित किया जाता है। मुख्य द्वार के आगे रंगोली बनाकर मां के चरणों को घर के अंदर प्रवेश करने की मुद्रा में चित्रित किया जाता है। बाजार से रैडीमेड लक्ष्मी-चरणों को लाकर भी रखा जा सकता है। इन सबके अतिरिक्त दीवाली पर रंगोली बनाने की परंपरा भी सदियों पुरानी है। लक्ष्मी-पूजन में फल-फूल, सुपारी, नारियल, दूध आदि का भी विशेष महत्व है।

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